विपक्ष को चुप करवा तानाशाही सरकार चला रहे मोदी – गुरजीत सिंह औजला
अमृतसर, पंजाब। सांसद गुरजीत सिंह औजला ने आज लोकसभा सेशन से लौटकर खुलासा किया कि बीजेपी की सरकार विपक्ष को चुप करवाकर तानाशाही सरकार चला रहा रही है। लोकसभा के अंदर विपक्षी नेताओं को बोलने का मौका नहीं दिया जाता और माइक्रोफोन बंद कर दिए जाते हैं वहीं डिप्टी स्पीकर की पोस्ट 2019 से खाली पड़ी है जबकि आर्टिकल 93 के तहत इसके चुनाव जरुरी है। सांसद गुरजीत सिंह औजला ने आप प्रेस ब्रीफ में जानकारी देते हुए कहा कि कांग्रेस लोगों के मुद्दे लोकसभा में उठाती रही है और हमेशा उठाना चाहती है। देश में लोकतंत्र तभी जिंदा रह सकता है जब विपक्ष सवाल उठाता रहे और सरकार उसका जवाब देती रहे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह विपक्ष को ही चुप करवा रहे हैं और तानाशाही चला रहे हैं लेकिन फिर कांग्रेस का लोगों से वादा है कि वह सरकार को जवाबदेही अवश्य बनाएंगे। उन्होंने कहा कि इस संबंधी लोकसभा के स्पीकर को लिखित में बताया गया है कि किस तरह मौजूदा केंद्र सरकार लोकसभा में अपनी पैठ बनाए रखने के लिए दूसरों को बोलने का मौका नहीं दे रही। उन्होंने बताया कि पत्र में लोकसभा स्पीकर से मांग की गई है कि इन गंभीर मुद्दों पर जल्द से जल्द कार्रवाई करें और लोकतंत्र को बहाल करें। इस अवसर पर आज उनके साथ पूर्व मंत्री डॉ. राज कुमार वेरका, पूर्व विधायक जुगल किशोर शर्मा, पूर्व विधायक सुनील दत्ती, डीसीसी ग्रामीण पूर्व अध्यक्ष भगवंत पाल सिंह सच्चर, पार्षद नरिंदर सिंह तुंग मौजूद रहे।
पत्र में लिखी गई खास बातें।
1. लोक सभा में उपसभापति की नियुक्ति न होना: संविधान के अनुच्छेद 93 के चुनाव को अनिवार्य करने के बावजूद, उपसभापति का पद 2019 से रिक्त है। उपसभापति की अनुपस्थिति एक खतरनाक मिसाल कायम करती है, जो सदन की निष्पक्षता और कामकाज को प्रभावित करती है।
2. विपक्ष के नेता (एलओपी) को बोलने का मौका न देना: विपक्ष के नेता को खड़े होने पर बोलने की अनुमति देने की परंपरा की बार-बार अवहेलना की गई है। यह पिछली संसदीय प्रथाओं से अलग है और सदन में स्वस्थ बहस के लिए जगह कम करता है।
3. विपक्षी नेताओं और सांसदों के माइक्रोफोन बंद किए जा रहे हैं। यह अक्सर होता है कि जब भी विपक्षी सांसद कोई मुद्दा उठाते हैं, तो उनके माइक्रोफोन बंद कर दिए जाते हैं, जबकि सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों को स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति दी जाती है। यह प्रथा सीधे तौर पर लोकतांत्रिक बहस और निष्पक्षता को कमजोर करती है।
4. बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (बीएसी) के फैसलों की अवहेलना: सरकार बीएसी से परामर्श या सूचना दिए बिना सदन में एकतरफा तरीके से कामकाज शुरू कर रही है। उदाहरण के लिए, पिछले हफ्ते सदन में प्रधानमंत्री का बयान बिना किसी पूर्व शेड्यूल या सूचना के दिया गया था।
5. बजट और अनुदान की मांग पर चर्चा में प्रमुख मंत्रालयों को शामिल न करना: महत्वपूर्ण मंत्रालयों को अब बजट आवंटन पर चर्चा से बाहर रखा जा रहा है, जिससे वित्तीय निर्णयों पर संसदीय निगरानी कम हो रही है।
6. नियम 193 के तहत चर्चाओं का अभाव: नियम 193, जो मतदान के बिना तत्काल सार्वजनिक मुद्दों पर बहस की अनुमति देता है, अब शायद ही कभी लागू किया जाता है, जिससे राष्ट्रीय मामलों पर जवाबदेही से बचा जा सकता है।
7. संसदीय स्थायी समितियों में हस्तक्षेप: संसदीय स्थायी समितियों का उद्देश्य स्वतंत्र रूप से कार्य करना है, जो विशेषज्ञ विधायी निगरानी प्रदान करती हैं। हालाँकि, ऐसे उदाहरण हैं जहाँ अध्यक्ष के कार्यालय ने हस्तक्षेप किया है, समिति की रिपोर्टों में सुधार का सुझाव दिया है, जो उनकी स्वायत्तता से समझौता करता है।
विक्रम शर्मा
अमृतसर, पंजाब, ब्यूरो रिपोर्ट
समय भारत 24×7